रविवार, 16 मार्च 2025

अध्याय 2 : गीता का सार (श्लोक 2 . 67)











अध्याय 2 : गीता का सार

श्लोक 2 . 67


इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोSनुविधीयते |

तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि  ६७ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

As a strong wind sweeps away a boat on the water, even one of the roaming senses on which the mind focuses can carry away a man’s intelligence.


भावार्थ

जिस प्रकार पानी में तैरती नाव को प्रचण्ड वायु दूर बहा ले जाती है उसी प्रकार विचरणशील इन्द्रियों में से कोई एक जिस पर मन निरन्तर लगा रहता है, मनुष्य की बुद्धि को हर लेती है |

 

तात्पर्य

यदि समस्त इन्द्रियाँ भगवान् की सेवा में न लगी रहें और यदि इनमें से एक भी अपनी तृप्ति में लगी रहती है, तो वह भक्त को दिव्य प्रगति-पथ से विपथ कर सकती है | जैसा कि महाराज अम्बरीष के जीवन में बताया गया है, समस्त इन्द्रियों को कृष्णभावनामृत में लगा रहना चाहिए क्योंकि मन को वश में करने की यही सही एवं सरल विधि है |