शनिवार, 28 मार्च 2026

अध्याय 11 : विराट रूप (श्लोक 11.30)









अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11.30


लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ता- ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः |

तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो  ३० 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

गुरुवार, 26 मार्च 2026

अध्याय 11 : विराट रूप (श्लोक 11 .29)









अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11 .29


यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः |

तथैव नाशाय विशन्ति लोका-स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः  २९ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

बुधवार, 25 मार्च 2026

अध्याय 11 : विराट रूप (श्लोक 11 .28)









अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11 .28


यथा नदीनां बहवोSम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति |

तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति  २८ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

मंगलवार, 24 मार्च 2026

अध्याय 11 : विराट रूप (श्लोक 11 .26 - 27)









अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11 .26 - 27


अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घै |

भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदियैरपि योधमुख्यै:  २६ 

वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि |

केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरूत्तमाङ्गै:  २७ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

गुरुवार, 19 मार्च 2026

अध्याय 11 : विराट रूप (श्लोक 11 .25)








अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11 .25


दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि

दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि |

दिशो न जाने न लभे च शर्म

प्रसीद देवेश जगन्निवास  २५ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

मंगलवार, 17 मार्च 2026

अध्याय 11 : विराट रूप (श्लोक 11 .24)









अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11 .24


नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं

व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् |

दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा

धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो  २४ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

सोमवार, 16 मार्च 2026

अध्याय 11 : विराट रूप (श्लोक 11 .23)









अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11 .23


रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं

महाबाहो बहुबाहूरूपादम् |

बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं

दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्  २३ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

रविवार, 15 मार्च 2026

अध्याय 11 : विराट रूप (श्लोक 11 .22)









अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11 .22


रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या

विश्र्वSश्र्विनौ मरुतश्र्चोष्मपाश्र्च |

गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा

वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्र्चैव सर्वे || २२ |


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

शनिवार, 14 मार्च 2026

अध्याय 11 : विराट रूप (श्लोक 11 .21)









अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11 .21


अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति

केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति |

स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः

स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः  २१ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

शुक्रवार, 13 मार्च 2026

अध्याय 11 : विराट रूप (श्लोक 11 .20)









अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11 .20


द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि 

व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्र्च सर्वाः | 

दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं 

लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्  २० 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

गुरुवार, 12 मार्च 2026

अध्याय 11 : विराट रूप (श्लोक 11 .19)









अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11 .19


अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य-

मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् |

पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं

स्वतेजसा विश्र्वमिदं तपन्तम्  १९ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

बुधवार, 11 मार्च 2026

अध्याय 11 : विराट रूप (श्लोक 11 .18)







अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11 .18


त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं

त्वमस्य विश्र्वस्य परं निधानम् |

त्वमव्ययः शाश्र्वतधर्मगोप्ता

सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे  १८ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

मंगलवार, 10 मार्च 2026

अध्याय 11 : विराट रूप (श्लोक 11 .17)









अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11 .17


किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च

तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् |

पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता-

द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्  १७ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada