सोमवार, 7 अप्रैल 2025

अध्याय 3 : कर्मयोग (श्लोक 3 . 17)









अध्याय 3 : कर्मयोग

श्लोक 3 . 17


यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्र्च मानवः |

आत्मन्येव च सन्तुष्टस्य कार्यं न विद्यते  १७ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

But for one who takes pleasure in the Self, whose human life is one of self-realization, and who is satisfied in the Self only, fully satiated – for him there is no duty.


भावार्थ

किन्तु जो व्यक्ति आत्मा में ही आनन्द लेता है और अपने कृष्णभावनामृत के कार्यों से पूर्णतया सन्तुष्ट रहता है उसके लिए कुछ करणीय (कर्तव्य) नहीं होता |

 

तात्पर्य

जो व्यक्ति कृष्णभावनाभावित है और अपने कृष्णभावनामृत के कार्यों से पूर्णतया सन्तुष्ट रहता है उसे कुछ भी नियत कर्म नहीं करना होता | कृष्णभावनाभावित होने के कारण उसके हृदय का सारा मैल तुरन्त धुल जाता है, जो हजारों-हजारों यज्ञों को सम्पन्न करने पर ही सम्भव हो पाटा है | इस प्रकार चेतना के शुद्ध होने से मनुष्य परमेश्र्वर के साथ अपने सम्बन्ध के प्रति पूर्णतया आश्र्वस्त हो जाता है | भगवत्कृपा से उसका कार्य स्वयंप्रकाशित हो जाता है; अतएव वैदिक आदेशों के प्रति उसका कर्तव्य निःशेष हो जाता है | ऐसा कृष्णभावनाभावित व्यक्ति कभी भी भौतिक कार्यों में रूचि नहीं लेता और न ही उसे सुरा, सुन्दरी तथा अन्य प्रलोभनों में कोई आनन्द मिलता है |