मंगलवार, 9 जून 2026

अध्याय 13 : प्रकृति, पुरुष तथा चेतना (श्लोक 13.29)












अध्याय 13 : प्रकृति, पुरुष तथा चेतना

श्लोक 13.29


समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमिश्र्वरम् |

न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्  २९ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

One who sees the Supersoul equally present everywhere, in every living being, does not degrade himself by his mind. Thus he approaches the transcendental destination.


भावार्थ

जो व्यक्ति परमात्मा को सर्वत्र तथा प्रत्येक जीव में समान रूप से वर्तमान देखता है, वह अपने मन के द्वारा अपने आपको भ्रष्ट नहीं करता | इस प्रकार वह दिव्य गन्तव्य को प्राप्त करता है |


तात्पर्य

जीव, अपना भौतिक अस्तित्व स्वीकार करने के कारण, अपने आध्यात्मिक अस्तित्व से पृथक् हो गया है | किन्तु यदि वह यह समझता है कि परमेश्र्वर अपने परमात्मा स्वरूप में सर्वत्र स्थित हैं, अर्थात् वह भगवान् की उपस्थिति प्रत्येक वस्तु में देखता है, तो वह विघटनकारी मानसिकता से अपने आपको नीचे नहीं गिराता, और इसलिए वह क्रमशः वैकुण्ठ-लोक की ओर बढ़ता जाता है | सामान्यतया मन इन्द्रियतृप्तिकारी कार्यों में लीन रहता है, लेकिन जब वही मन परमात्मा की ओर अन्मुख होता है, तो मनुष्य आध्यात्मिक ज्ञान में आगे बढ़ जाता है |