मंगलवार, 20 मई 2025

अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान (श्लोक 4 . 17)









अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान

श्लोक 4 . 17


कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः |

अकर्मणश्र्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः  १७ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

The intricacies of action are very hard to understand. Therefore one should know properly what action is, what forbidden action is and what inaction is.


भावार्थ

कर्म की बारीकियों को समझना अत्यन्त कठिन है | अतः मनुष्य को चाहिए कि वह यह ठीक से जाने कि कर्म क्या है, विकर्म क्या है और अकर्म क्या है |


तात्पर्य

यदि कोई सचमुच ही भव-बन्धन से मुक्ति चाहता है तो उसे कर्म, अकर्म तथा विकर्म के अन्तर को समझना होगा | कर्म, अकर्म तथा विकर्म के विश्लेषण की आवश्यकता है, क्योंकि यह अत्यन्त गहन विषय है | कृष्णभावनामृत को तथा गुणों के अनुसार कर्म को समझने के लिए परमेश्र्वर के साथ सम्बन्ध को जानना होगा | दूसरे शब्दों में, जिसने यह भलीभाँति समझ लिया है, वह जानता है कि जीवात्मा भगवान् का नित्य दास है और फलस्वरूप उसे कृष्णभावनामृत में कार्य करना है | सम्पूर्ण भगवद्गीता का यही लक्ष्य है | इस भावनामृत के विरुद्ध सारे निष्कर्ष एवं परिणाम विकर्म या निषिद्ध कर्म हैं | इसे समझने के लिए मनुष्य को कृष्णभावनामृत के अधिकारियों की संगति करनी होती है और उनसे रहस्य को समझना होता है | यह साक्षात् भगवान् से समझने के समान है | अन्यथा बुद्धिमान् से बुद्धिमान् मनुष्य भी मोहग्रस्त हो जाएगा |