गुरुवार, 22 मई 2025

अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान (श्लोक 4 . 19)









अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान

श्लोक 4 . 19


यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः |

ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहु: पण्डितं बुधाः  १९ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

One is understood to be in full knowledge whose every endeavor is devoid of desire for sense gratification. He is said by sages to be a worker for whom the reactions of work have been burned up by the fire of perfect knowledge.


भावार्थ

जिस व्यक्ति का प्रत्येक प्रयास (उद्यम) इन्द्रियतृप्ति की कामना से रहित होता है, उसे पूर्णज्ञानी समझा जाता है | उसे ही साधु पुरुष ऐसा कर्ता कहते हैं, जिसने पूर्णज्ञान की अग्नि से कर्मफलों को भस्मसात् कर दिया है |


तात्पर्य

केवल पूर्णज्ञानी ही कृष्णभावनाभावित व्यक्ति के कार्यकलापों को समझ सकता है | ऐसे व्यक्ति में इन्द्रियतृप्ति की प्रवृत्ति का अभाव रहता है, इससे यह समझा जाता है कि भगवान् के नित्य दास रूप में उसे अपने स्वाभाविक स्वरूप का पुर्नज्ञान है जिसके द्वारा उसने अपने कर्मफलों को भस्म कर दिया है | जिसने ऐसा पुर्नज्ञान प्राप्त कर लिया है वह सचमुच विद्वान है | भगवान् की नित्य दासता के इस ज्ञान के विकास की तुलना अग्नि से की गई है | ऐसी अग्नि एक बार प्रज्ज्वलित हो जाने पर कर्म के सारे फलों को भस्म कर सकती है |