सोमवार, 30 जून 2025

अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म (श्लोक 5 . 17)









अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म

श्लोक 5 . 17


तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः |

गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः  १७ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

रविवार, 29 जून 2025

अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म (श्लोक 5 . 16)









अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म

श्लोक 5 . 16


ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः |

तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्  १६ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

शनिवार, 28 जून 2025

अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म (श्लोक 5 . 15)










अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म

श्लोक 5 . 15


नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभु: |

अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः  १५ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

शुक्रवार, 27 जून 2025

अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म (श्लोक 5 . 14)









अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म

श्लोक 5 . 14


न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभु: |

न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते  १४ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

गुरुवार, 26 जून 2025

अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म (श्लोक 5 . 13)









अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म

श्लोक 5 . 13


सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्यास्ते सुखं वशी |

नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्  १३ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

बुधवार, 25 जून 2025

अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म (श्लोक 5 . 12)












अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म

श्लोक 5 . 12


युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् |

अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते  १२ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

मंगलवार, 24 जून 2025

अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म (श्लोक 5 . 11)









अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म

श्लोक 5 . 11


कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि |

योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मश्रुद्धये  ११ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

सोमवार, 23 जून 2025

अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म (श्लोक 5 . 10)









अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म

श्लोक 5 . 10


ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः |

लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा  १० 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

रविवार, 22 जून 2025

अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म (श्लोक 5 . 8-9)









अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म

श्लोक 5 . 8-9


नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् |

पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्र्नन्गच्छन्स्वपन्श्र्वसन्  ८ 


प्रलपन्विसृजन्गृह्रन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि |

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्  ९ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

शनिवार, 21 जून 2025

अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म (श्लोक 5 . 7)









अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म

श्लोक 5 . 7


योगयुक्तो विश्रुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः |

सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते  ७ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

शुक्रवार, 20 जून 2025

अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म (श्लोक 5 . 6)









अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म

श्लोक 5 . 6


संन्यासस्तु महाबाहो दु:खमाप्तुमयोगतः |

योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति  ६ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

गुरुवार, 19 जून 2025

अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म (श्लोक 5 . 5)









अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म

श्लोक 5 . 5


यत्सांख्यै: प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते |

एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति  ५ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

बुधवार, 18 जून 2025

अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म (श्लोक 5 . 4)









अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म

श्लोक 5 . 4


सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः |

एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्  ४ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

मंगलवार, 17 जून 2025

अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म (श्लोक 5 . 3)









अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म

श्लोक 5 . 3


ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति |

निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते  ३ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

सोमवार, 16 जून 2025

अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म (श्लोक 5 . 2)









अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म

श्लोक 5 . 2


श्रीभगवानुवाच

सन्न्यासः कर्मयोगश्र्च निःश्रेयसकरावुभौ |

तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते || २ |


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

रविवार, 15 जून 2025

अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म (श्लोक 5 . 1)









अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म

श्लोक 5 . 1


अर्जुन उवाच

सन्न्यासं कर्म णां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि |

यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्र्चितम्  १ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

शनिवार, 14 जून 2025

अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान (श्लोक 4 . 42)









अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान

श्लोक 4 . 42


तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः |

छित्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत  ४२ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

शुक्रवार, 13 जून 2025

अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान (श्लोक 4 . 41)












अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान

श्लोक 4 . 41


योगसन्न्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् |

आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय  ४१ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

गुरुवार, 12 जून 2025

अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान (श्लोक 4 . 40)









अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान

श्लोक 4 . 40


अज्ञश्र्चाद्यधानश्र्च संशयात्मा विनश्यति |

नायं लोकोSस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः  ४० 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

बुधवार, 11 जून 2025

अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान (श्लोक 4 . 39)









अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान

श्लोक 4 . 39


श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः |

ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति  ३९ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

मंगलवार, 10 जून 2025

अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान (श्लोक 4 . 38)









अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान

श्लोक 4 . 38


न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते |

तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति || ३८ | |


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 


In this world, there is nothing so sublime and pure as transcendental knowledge. Such knowledge is the mature fruit of all mysticism. And one who has become accomplished in the practice of devotional service enjoys this knowledge within himself in due course of time.


भावार्थ

इस संसार में दिव्यज्ञान के सामान कुछ भी उदात्त तथा शुद्ध नहीं है | ऐसा ज्ञान समस्त योग का परिपक्व फल है | जो व्यक्ति भक्ति में सिद्ध हो जाता है, वह यथासमय अपने अन्तर में इस ज्ञान का आस्वादन करता है |


तात्पर्य

जब हम दिव्यज्ञान की बात करते हैं तो हमारा प्रयोजन अध्यात्मिक ज्ञान से होता है | निस्सन्देह दिव्यज्ञान के सामान कुछ भी उदात्त और शुद्ध नहीं है | अज्ञान ही हमारे बन्धन का कारण है और ज्ञान हमारी मुक्ति का | यह ज्ञान भक्ति का परिपक्व फल है | जब कोई दिव्यज्ञान की अवस्था प्राप्त कर लेता है तो उसे अन्यत्र शान्ति खोजने की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि वह मन ही मन शान्ति का आनन्द लेता रहता है | दुसरे शब्दों में, ज्ञान तथा शान्ति का पर्यवसान कृष्णभावनामृत में होता है | भगवद्गीता के सन्देश की यही चरम परिणति है |


सोमवार, 9 जून 2025

अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान (श्लोक 4 . 37)









अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान

श्लोक 4 . 37


यथैधांसि समिद्धोSग्निर्भस्मसात्कुरुतेSर्जुन |

ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा  ३७ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

रविवार, 8 जून 2025

अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान (श्लोक 4 . 36)









अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान

श्लोक 4 . 36


अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः |

सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि  ३६ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

शनिवार, 7 जून 2025

अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान (श्लोक 4 . 35)









अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान

श्लोक 4 . 35


यज्ज्ञात्वा न पुनार्मोह मेवं यास्यसि पाण्डव |

येन भूतान्यशेषाणि द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि  ३५ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

शुक्रवार, 6 जून 2025

अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान (श्लोक 4 . 34)









अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान

श्लोक 4 . 34


तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया |

उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः  ३४ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

गुरुवार, 5 जून 2025

अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान (श्लोक 4 . 33)

अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान

श्लोक 4 . 33


श्रेयान्द्रव्यमयाज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप |

सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते  ३३ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

बुधवार, 4 जून 2025

अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान (श्लोक 4 . 32)

अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान

श्लोक 4 . 32


एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे |

कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे  ३२ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

मंगलवार, 3 जून 2025

अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान (श्लोक 4 . 31)

अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान

श्लोक 4 . 31


नायं लोकोSस्त्ययज्ञस्य कुतोSन्यः कुरुसत्तम  ३१ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

सोमवार, 2 जून 2025

अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान (श्लोक 4 . 30)

अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान

श्लोक 4 . 30


सर्वेSप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः |

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्  ३० |


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

रविवार, 1 जून 2025

अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान (श्लोक 4 . 29)

अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान

श्लोक 4 . 29


अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेSपानं तथापरे |

प्राणापानगति रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः |


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada