रविवार, 8 जून 2025

अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान (श्लोक 4 . 36)









अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान

श्लोक 4 . 36


अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः |

सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि  ३६ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

Even if you are considered to be the most sinful of all sinners, when you are situated in the boat of transcendental knowledge you will be able to cross over the ocean of miseries.


भावार्थ

यदि तुम्हें समस्त पापियों में भी सर्वाधिक पापी समझा जाये तो भी तुम दिव्यज्ञान रूपी नाव में स्थित होकर दुख-सागर को पार करने में समर्थ होगे ।


तात्पर्य

श्री कृष्ण के सम्बन्ध में अपनी स्वाभाविक स्थिति का सही-सही ज्ञान इतना उत्तम होता है कि अज्ञान-सागर में चलने वाले जीवन-संघर्ष से मनुष्य तुरन्त ही ऊपर उठ सकता है । यह भौतिक जगत् कभी-कभी अज्ञान सागर मान लिया जाता है तो कभी जलता हुआ जंगल । सागर में कोई कितना ही कुशल तैराक क्यों न हो, जीवन-संघर्ष अत्यन्त कठिन है । यदि कोई संघर्षरत तैरने वाले को आगे बढ़कर समुद्र से निकाल लेता है तो वह सबसे बड़ा रक्षक है । भगवान् से प्राप्त पूर्णज्ञान मुक्ति का पथ है । कृष्णभावनामृत की नाव अत्यन्त सुगम है, किन्तु उसी के साथ-साथ अत्यन्त उदात्त भी ।