मंगलवार, 10 जून 2025

अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान (श्लोक 4 . 38)









अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान

श्लोक 4 . 38


न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते |

तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति || ३८ | |


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 


In this world, there is nothing so sublime and pure as transcendental knowledge. Such knowledge is the mature fruit of all mysticism. And one who has become accomplished in the practice of devotional service enjoys this knowledge within himself in due course of time.


भावार्थ

इस संसार में दिव्यज्ञान के सामान कुछ भी उदात्त तथा शुद्ध नहीं है | ऐसा ज्ञान समस्त योग का परिपक्व फल है | जो व्यक्ति भक्ति में सिद्ध हो जाता है, वह यथासमय अपने अन्तर में इस ज्ञान का आस्वादन करता है |


तात्पर्य

जब हम दिव्यज्ञान की बात करते हैं तो हमारा प्रयोजन अध्यात्मिक ज्ञान से होता है | निस्सन्देह दिव्यज्ञान के सामान कुछ भी उदात्त और शुद्ध नहीं है | अज्ञान ही हमारे बन्धन का कारण है और ज्ञान हमारी मुक्ति का | यह ज्ञान भक्ति का परिपक्व फल है | जब कोई दिव्यज्ञान की अवस्था प्राप्त कर लेता है तो उसे अन्यत्र शान्ति खोजने की आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि वह मन ही मन शान्ति का आनन्द लेता रहता है | दुसरे शब्दों में, ज्ञान तथा शान्ति का पर्यवसान कृष्णभावनामृत में होता है | भगवद्गीता के सन्देश की यही चरम परिणति है |