शुक्रवार, 27 जून 2025

अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म (श्लोक 5 . 14)









अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म

श्लोक 5 . 14


न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभु: |

न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते  १४ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

The embodied spirit, master of the city of his body, does not create activities, nor does he induce people to act, nor does he create the fruits of action. All this is enacted by the modes of material nature.


भावार्थ

शरीर रूपी नगर का स्वामी देहधारी जीवात्मा न तो कर्म का सृजन करता है, न लोगों को कर्म करने के लिए प्रेरित करता है, न ही कर्मफल की रचना करता है | यह सब तो प्रकृति के गुणों द्वारा ही किया जाता है |


तात्पर्य

जैसा कि सातवें अध्याय में बताया जाएगा जीव तो परमेश्र्वर की शक्तियों में से एक है, किन्तु वह पदार्थ से भिन्न है जो भगवान् की अपरा प्रकृति है | संयोगवश परा प्रकृति या जीव अनादिकाल से प्रकृति (अपरा) के सम्पर्क में रहा है | जिस नाशवान शरीर या भौतिक आवास को वह प्राप्त करता है वह अनेक कर्मों तथा उनके फलों का कारण है | ऐसे बद्ध वातावरण में रहते हुए मनुष्य अपने आपको (अज्ञानवश) शरीर मानकर शरीर के कर्मफलों का भोग करता है | अनन्त काल से उपार्जित यह अज्ञान ही शारीरिक सुख-दुख का कारण है | ज्योंही जीव शरीर के कार्यों से पृथक् हो जाता है त्योंही वह कर्मबन्धन से भी मुक्त हो जाता है | जब तक वह शरीर रूपी नगर में निवास करता है तब तक वह इसका स्वामी प्रतीत होता है, किन्तु वास्तव में वह न तो इसका स्वामी होता है और न इसके कर्मों तथा फलों का नियन्ता ही | वह तो इस भवसागर के बीच जीवन-संघर्ष से रत प्राणी है | सागर की लहरें उसे उछालती रहती हैं, किन्तु उन पर उसका वश नहीं चलता | उसके उद्धार का एकमात्र साधन है कि दिव्य कृष्णभावनामृत द्वारा समुद्र के बाहर आए | इसी के द्वारा समस्त अशान्ति से उसकी रक्षा हो सकती है |