शुक्रवार, 13 जून 2025

अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान (श्लोक 4 . 41)












अध्याय 4 : दिव्य ज्ञान

श्लोक 4 . 41


योगसन्न्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् |

आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय  ४१ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

One who acts in devotional service, renouncing the fruits of his actions, and whose doubts have been destroyed by transcendental knowledge, is situated factually in the self. Thus he is not bound by the reactions of work, O conqueror of riches.


भावार्थ

जो व्यक्ति अपने कर्मफलों का परित्याग करते हुए भक्ति करता है और जिसके संशय दिव्यज्ञान द्वारा विनष्ट हो चुके होते हैं वही वास्तव में आत्मपरायण है | हे धनञ्जय! वह कर्मों के बन्धन से नहीं बँधता |


तात्पर्य

जो मनुष्य भगवद्गीता की शिक्षा का उसी रूप में पालन करता है जिस रूप में भगवान् श्रीकृष्ण ने दी थी, वो वह दिव्यज्ञान की कृपा से समस्त संशयों से मुक्त हो जाता है | पूर्णतः कृष्णभावनाभावित होने के कारण उसे श्रीभगवान् के अंश रूप में अपने स्वरूप का ज्ञान पहले ही हो जाता है | अतएव निस्सन्देह वह कर्मबन्धन से मुक्त है |