अध्याय 7 : भगवद्ज्ञान
श्लोक 7 . 12
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्र्च ये |
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि १२
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
Know that all states of being – be they of goodness, passion or ignorance – are manifested by My energy. I am, in one sense, everything, but I am independent. I am not under the modes of material nature, for they, on the contrary, are within Me.
भावार्थ
तुम जान लो कि मेरी शक्ति द्वारा सारे गुण प्रकट होते हैं, चाहे वे सतोगुण हों, रजोगुण हों या तमोगुण हों | एक प्रकार से मैं सब कुछ हूँ, किन्तु हूँ स्वतन्त्र | मैं प्रकृति के गुणों के अधीन नहीं हूँ, अपितु वे मेरे अधीन हैं |
तात्पर्य
संसार के सारे भौतिक कार्यकलाप प्रकृति के गुणों के अधीन सम्पन्न होते हैं | यद्यपि प्रकृति के गुण परमेश्र्वर कृष्ण से उद्भूत हैं, किन्तु भगवान् उनके अधीन नहीं होते | उदाहरणार्थ, राज्य के नियमानुसार कोई दण्डित हो सकता है, किन्तु नियम बनाने वाला राजा उस नियम के अधीन नहीं होता | इसी प्रकार प्रकृति के सभी गुण – सतो, रजो तथा तमोगुण – भगवान् कृष्ण से उद्भूत हैं, किन्तु कृष्ण प्रकृति के अधीन नहीं हैं | इसीलिए वे निर्गुण हैं, जिसका तात्पर्य है कि सभी गुण उनसे उद्भूत हैं, किन्तु ये उन्हें प्रभावित नहीं करते | यह भगवान् का विशेष लक्षण है |
