शुक्रवार, 19 जून 2026

अध्याय 14 : प्रकृति के तीन गुण (श्लोक 14.1)











अध्याय 14 : प्रकृति के तीन गुण

श्लोक 14.1


श्रीभगवानुवाच |

परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् |

यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः  १ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

The Supreme Personality of Godhead said: Again I shall declare to you this supreme wisdom, the best of all knowledge, knowing which all the sages have attained the supreme perfection.


भावार्थ

भगवान् ने कहा - अब मैं तुमसे समस्त ज्ञानों में सर्वश्रेष्ठ इस परम ज्ञान को पुनः कहूँगा, जिसे जान लेने पर समस्त मुनियों ने परम सिद्धि प्राप्त की है |


तात्पर्य

सातवें अध्याय से लेकर बारहवें अध्याय तक श्रीकृष्ण परम सत्य भगवान् के विषय में विस्तार से बताते हैं | अब भगवान् स्वयं अर्जुन को और आगे ज्ञान दे रहे हैं | यदि कोई इस अध्याय को दार्शनिक चिन्तन द्वारा भलीभाँति समझ ले तो उसे भक्ति का ज्ञान हो जाएगा | तेरहवें अध्याय में यह स्पष्ट बताया जा चूका है कि विनयपूर्वक ज्ञान का विकास करते हुए भवबन्धन से छूटा जा सकता है | यह भी बताया जा चूका है कि प्रकृति के गुणों की संगति के फलस्वरूप ही जीव इस भौतिक जगत् में बद्ध है | अब इस अध्याय में भगवान् स्वयं बताते हैं कि वे प्रकृति के गुण कौन-कौन से हैं, वे किस प्रकार क्रिया करते हैं, किस तरह बाँधते हैं और किस प्रकार मोक्ष प्रदान करते हैं | इस अध्याय में जिस ज्ञान का प्रकाश किया गया है उसे अन्य पूर्ववर्ती अध्यायों में दिए गये ज्ञान से श्रेष्ठ बताया गया है | इस ज्ञान को प्राप्त करके अनेक मुनियों ने सिद्धि प्राप्त की और वैकुण्ठलोक के भागी हुए | अब भगवान् उसी ज्ञान को और अच्छे ढंग से बताने जा रहे हैं | यह ज्ञान अभी तक बताये गये समस्त ज्ञानयोग से कहीं अधिक श्रेष्ठ है और इसे जान लेने पर अनेक लोगों को सिद्धि प्राप्त हुई है | अतः यह आशा की जाती है कि जो भी इस अध्याय को समझेगा उसे सिद्धि प्राप्त होगी |