गुरुवार, 11 दिसंबर 2025

अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य (श्लोक 10 . 16)









अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य

श्लोक 10 . 16


वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः |

याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि  १६ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

Please tell me in detail of Your divine opulences by which You pervade all these worlds.


भावार्थ

कृपा करके विस्तारपूर्वक मुझे अपने उन दैवी ऐश्र्वर्यों को बतायें, जिनके द्वारा आप इन समस्त लोकों में व्याप्त हैं |


तात्पर्य

इस श्लोक से लगता है कि अर्जुन भगवान् सम्बन्धी अपने ज्ञान से पहले से संतुष्ट है | कृष्ण-कृपा से अर्जुन को व्यक्तिगत अनुभव, बुद्धि तथा ज्ञान और मनुष्य को इन साधनों से जो कुछ भी प्राप्त हो सकता है, वह सब प्राप्त है, तथा उसने कृष्ण को भगवान् के रूप में समझ रखा है | उसे किसी प्रकार का संशय नहीं है, तो भी वह कृष्ण से अपनी सर्वव्यापकता की व्याख्या करने के लिए अनुरोध करता है | सामान्यजन तथा विशेषरूप से निर्विशेषवादी भगवान् की सर्वव्यापकता के विषय में अधिक विचारशील रहते हैं | अतः अर्जुन श्रीकृष्ण से पूछता है कि वे अपनी विभिन्न शक्तियों के द्वारा किस प्रकार सर्वव्यापी रूप में विद्यमान रहते हैं | हमें यह जानना चाहिए कि अर्जुन सामान्य लोगों के हित के लिए यह पूछ रहा है |