सोमवार, 20 जनवरी 2025

अध्याय 2 : गीता का सार (श्लोक 2 . 11)











अध्याय 2 : गीता का सार

श्लोक 2 . 11


श्रीभगवानुवाच

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्र्च भाषसे |       

गतासूनगतासूंश्र्च नानुशोचन्ति पण्डिताः  ११ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

The Supreme Personality of Godhead said: While speaking learned words, you are mourning for what is not worthy of grief. Those who are wise lament neither for the living nor for the dead.


भावार्थ

श्री भगवान् ने कहा – तुम पाण्डित्यपूर्ण वचन कहते हुए उनके लिए शोक कर रहे हो जो शोक करने योग्य नहीं है | जो विद्वान होते हैं, वे न तो जीवित के लिए, न ही मृत के लिए शोक करते हैं |

 

 तात्पर्य

 भगवान् ने तत्काल गुरु का पद सँभाला और अपने मित्र को अप्रत्यक्षतः मुर्ख कह कर डाँटा | उन्होंने कहा, “तुम विद्वान की तरह बातें करते हो, किन्तु तुम यह नहीं जानते कि जो विद्वान होता है – अर्थात् जो यह जानता है कि शरीर तथा आत्मा क्या है – वह किसी भी अवस्था में शरीर के लिए, चाहे वह जीवित हो या मृत – शोक नहीं करता |” अगले अध्यायों से यह स्पष्ट हो जायेगा कि ज्ञान का अर्थ पदार्थ तथा आत्मा एवं दोनों के नियामक को जानना है | अर्जुन का तर्क था कि राजनीति या समाजनीति की अपेक्षा धर्म को अधिक महत्त्व मिलना चाहिए, किन्तु उसे यह ज्ञात न था कि पदार्थ, आत्मा तथा परमेश्र्वर का ज्ञान धार्मिक सूत्रों से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है | और चूँकि उसमे इस ज्ञान का अभाव था, अतः उसे विद्वान नहीं बनना चाहिए था | और चूँकि वह अत्यधिक विद्वान नहीं था इसीलिए वह शोक के सर्वथा अयोग्य वास्तु के लिए शोक कर रहा था | यह शारीर जन्मता है और आज या कल इसका विनाश निश्चित है, अतः शरीर उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना कि आत्मा है | जो इस तथ्य को जानता है वही असली विद्वान है और उसके लिए शोक का कोई कारण नहीं हो सकता |