शुक्रवार, 4 जुलाई 2025

अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म (श्लोक 5 . 21)

अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म

श्लोक 5 . 21


बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् |

स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्र्नुते  २१ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

Such a liberated person is not attracted to material sense pleasure but is always in trance, enjoying the pleasure within. In this way the self-realized person enjoys unlimited happiness, for he concentrates on the Supreme.


भावार्थ

ऐसा मुक्त पुरुष भौतिक इन्द्रियसुख की ओर आकृष्ट नहीं होता, अपितु सदैव समाधि में रहकर अपने अन्तर में आनन्द का अनुभव करता है | इस प्रकार स्वरुपसिद्ध व्यक्ति परब्रह्म में एकाग्रचित्त होने के कारण असीम सुख भोगता है |

 

तात्पर्य

कृष्णभावनामृत के महान भक्त श्री यामुनाचार्य ने कहा है –


यदवधि मम चेतः कृष्णपादारविन्दे

नवनवरसधामन्युद्यतं रन्तु मासीत् |

तदवधि बत नारीसंगमे स्मर्यमाने

भवति मुखविकारः सृष्ठु निष्ठीवनं च ||


“जब से मैं कृष्ण की दिव्य प्रेमाभक्ति में लगकर उनमें नित्य नवीन आनन्द का अनुभव करने में लगा हूँ और मेरे होंठ अरुचि से सिमट जाते हैं |” ब्रह्मयोगी अथवा कृष्णभावनाभावित व्यक्ति भगवान् की प्रेमाभक्ति में इतना अधिक लीन रहता है कि इन्द्रियसुख में उसकी तनिक भी रूचि नहीं रह जाती | भौतिकता की दृष्टि में कामसुख ही सर्वोपरि आनन्द है | सारा संसार उसी के वशीभूत है और भौतिकतावादी लोग तो इस प्रोत्साहन के बिना कोई कार्य ही नहीं कर सकते | किन्तु कृष्णभावनामृत में लीन व्यक्ति कामसुख के बिना ही उत्साहपूर्वक अपना कार्य करता रहता है | यही अतम-साक्षात्कार की कसौटी है | आत्म-साक्षात्कार तथा कामसुख कभी साथ-साथ नहीं चलते | कृष्णभावनाभावित व्यक्ति जीवन्मुक्त होने के कारण किसी प्रकार के इन्द्रियसुख द्वारा आकर्षित नहीं होता |