सोमवार, 7 जुलाई 2025

अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म (श्लोक 5 . 24)

अध्याय 5 : कर्मयोग - कृष्णभावनाभावित कर्म

श्लोक 5 . 24


योSन्तःसुखोSन्तरारामस्तथान्तज्योर्तिरेव यः |

स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोSधिगच्छति  २४ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

One whose happiness is within, who is active and rejoices within, and whose aim is inward is actually the perfect mystic. He is liberated in the Supreme, and ultimately he attains the Supreme.


भावार्थ

जो अन्तःकरण में सुख का अनुभव करता है, जो कर्मठ है और अन्तःकरण में ही रमण करता है तथा जिसका लक्ष्य अन्तर्मुखी होता है वह सचमुच पूर्ण योगी है | वह परब्रह्म में मुक्त पाता है और अन्ततोगत्वा ब्रह्म को प्राप्त होता है |

 

तात्पर्य

जब तक मनुष्य अपने अन्तःकरण में सुख का अनुभव नहीं करता तब तक भला बाह्यसुख को प्राप्त कराने वाली बाह्य क्रियाओं से वह कैसे छूट सकता है? मुक्त पुरुष वास्तविक अनुभव द्वारा सुख भोगता है | अतः वह किसी भी स्थान में मौनभाव से बैठकर अन्तःकरण में जीवन के कार्यकलापों का आनन्द लेता है | ऐसा मुक्त पुरुष कभी बाह्य भौतिक सुख की कामना नहीं करता | यह अवस्था ब्रह्मभूत कहलाती है, जिसे प्राप्त करने पर भगवद्धाम जाना निश्चित है |