सोमवार, 28 जुलाई 2025

अध्याय 6 : ध्यानयोग (श्लोक 6 . 19)








अध्याय 6 : ध्यानयोग

श्लोक 6 . 19


यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता |

योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः  १९ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

As a lamp in a windless place does not waver, so the transcendentalist, whose mind is controlled, remains always steady in his meditation on the transcendent Self.


भावार्थ

जिस प्रकार वायुरहित स्थान में दीपक हिलता-डुलता नहीं, उसी तरह जिस योगी का मन वश में होता है, वह आत्मतत्त्व के ध्यान में सदैव स्थिर रहता है |

 

तात्पर्य

कृष्णभावनाभावित व्यक्ति अपने आराध्य देव के चिन्तन में उसी प्रकार अविचलित रहता है जिस प्रकार वायुरहित स्थान में एक दीपक रहता है |