मंगलवार, 15 जुलाई 2025

अध्याय 6 : ध्यानयोग (श्लोक 6 . 4)









अध्याय 6 : ध्यानयोग

श्लोक 6 . 4


यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते |

सर्वसङ्कल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते  ४ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

A person is said to be elevated in yoga when, having renounced all material desires, he neither acts for sense gratification nor engages in fruitive activities.


भावार्थ

जब कोई पुरुष समस्त भौतिक इच्छाओं का त्यागा करके न तो इन्द्रियतृप्ति के लिए कार्य करता है और न सकामकर्मों में प्रवृत्त होता है तो वह योगारूढ कहलाता है |

 

तात्पर्य

जब मनुष्य भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में पूरी तरह लगा रहता है तो वह अपने आप में प्रसन्न रहता है और इस तरह वह इन्द्रियतृप्ति या सकामकर्म में प्रवृत्त नहीं होता | अन्यथा इन्द्रियतृप्ति में लगना ही पड़ता है, क्योंकि कर्म किए बिना कोई रह नहीं सकता | बिना कृष्णभावनामृत के मनुष्य सदैव स्वार्थ में तत्पर रहता है | किन्तु कृष्णभावनाभावित व्यक्ति कृष्ण की प्रसन्नता के लिए ही सब कुछ करता है, फलतः वह इन्द्रियतृप्ति से पूरी तरह विरक्त रहता है | जिसे ऐसी अनुभूति प्राप्त नहीं है उसे चाहिए कि भौतिक इच्छाओं से बचे रहने का वह यंत्रवत् प्रयास करे, तभी वह योग की सीढ़ी से ऊपर पहुँच सकता है |