शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2025

अध्याय 2 : गीता का सार (श्लोक 2 . 36)









अध्याय 2 : गीता का सार

श्लोक 2 . 36


अवाच्यवादांश्र्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिताः |

निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्  ३६ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

Your enemies will describe you in many unkind words and scorn your ability. What could be more painful for you?


भावार्थ

तुम्हारे शत्रु अनेक प्रकार के कटु शब्दों से तुम्हारा वर्णन करेंगे और तुम्हारी सामर्थ्य का उपहास करेंगे | तुम्हारे लिए इससे दुखदायी और क्या हो सकता है?


तात्पर्य 

प्रारम्भ में ही भगवान् कृष्ण को अर्जुन के अयाचित दयाभाव पर आश्चर्य हुआ था और उन्होंने इस दयाभाव को अनार्योचित बताया था | अब उन्होंने विस्तार से अर्जुन के तथाकथित दयाभाव के विरुद्ध कहे गये अपने वचनों को सिद्ध कर दिया है |