गुरुवार, 27 फ़रवरी 2025

अध्याय 2 : गीता का सार (श्लोक 2 . 50)









अध्याय 2 : गीता का सार

श्लोक 2 . 50


बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते । 

तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥५०॥


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

A man engaged in devotional service rids himself of both good and bad reactions even in this life. Therefore strive for yoga, which is the art of all work.


भावार्थ

भक्ति में संलग्न मनुष्य इस जीवन में ही अच्छे तथा बुरे कार्यों से अपने को मुक्त कर लेता है | अतः योग के लिए प्रयत्न करो क्योंकि सारा कार्य-कौशल यही है |


तात्पर्य

जीवात्मा अनादि काल से अपने अच्छे तथा बुरे कर्म के फलों को संचित करता रहा है | फलतः वह निरन्तर अपने स्वरूप से अनभिज्ञ बना रहा है | इस अज्ञान को भगवद्गीता के उपदेश से दूर किया जा सकता है | यह हमें पूर्ण रूप में भगवान् श्रीकृष्ण की शरण में जाने तथा जन्म-जन्मान्तर कर्म-फल की शृंखला का शिकार बनने से मुक्त होने का उपदेश देती है, अतः अर्जुन को कृष्णभावनामृत में कार्य करने के लिए कहा गया है क्योंकि कर्मफल के शुद्ध होने की यही प्रक्रिया है |