शनिवार, 22 फ़रवरी 2025

अध्याय 2 : गीता का सार (श्लोक 2 . 45)









अध्याय 2 : गीता का सार

श्लोक 2 . 45


त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन |

निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्  ४५ 

 

Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

The Vedas deal mainly with the subject of the three modes of material nature. O Arjuna, become transcendental to these three modes. Be free from all dualities and from all anxieties for gain and safety, and be established in the self.


भावार्थ

वेदों में मुख्यतया प्रकृति के तीनों गुणों का वर्णन हुआ है | हे अर्जुन! इन तीनों गुणों से ऊपर उठो | समस्त द्वैतों और लाभ तथा सुरक्षा की सारी चिन्ताओं से मुक्त होकर आत्म-परायण बनो |


तात्पर्य

सारे भौतिक कार्यों में प्रकृति के तीनों गुणों की क्रियाएँ तथा प्रतिक्रियाएँ निहित होती हैं | इनका उद्देश्य कर्म-फल होता है जो भौतिक जगत् में बन्धन का कारण है | वेदों में मुख्यतया सकाम कर्मों का वर्णन है जिससे सामान्य जन क्रमशः इन्द्रियतृप्ति के क्षेत्र से उठकर अध्यात्मिक धरातल तक पहुँच सकें | कृष्ण अपने शिष्य तथा मित्र के रूप में अर्जुन को सलाह देते हैं कि वह वेदान्त दर्शन के अध्यात्मिक पद तक ऊपर उठे जिसका प्रारम्भ ब्रह्म-जिज्ञासा अथवा परम अध्यात्मिकता पद पर प्रश्नों से होता है | इस भौतिक जगत् के सारे प्राणी अपने अस्तित्व के लिए कठिन संघर्ष करते रहते हैं | उनके लिए भगवान् ने इस भौतिक जगत् की सृष्टि करने के पश्चात् वैदिक ज्ञान प्रदान किया जो जीवन-यापन तथा भवबन्धन से छूटने का उपदेश देता है | जब इन्द्रियतृप्ति के कार्य यथा कर्मकाण्ड समाप्त हो जाते हैं तो उपनिषदों के रूप में भगवत् साक्षात्कार का अवसर प्रदान किया जाता है | ये उपनिषद् विभिन्न वेदों के अंश हैं उसी प्रकार जैसे भगवद्गीता पंचम वेद महाभारत का एक अंग है | उपनिषदों से अध्यात्मिक जीवन का शुभारम्भ होता है |


जब तक भौतिक शरीर का अस्तित्व है तब तक भौतिक गुणों की क्रियाएँ-प्रतिक्रियाएँ होती रहती हैं | मनुष्य को चाहिए कि सुख-दुख या शीत-ग्रीष्म जैसी द्वैतताओं को सहन करना सीखे और इस प्रकार हानि तथा लाभ की चिन्ता से मुक्त हो जाय | जब मनुष्य कृष्ण की इच्छा पर पूर्णतया आश्रित रहता है तो यह दिव्य अवस्था प्राप्त होती है |