गुरुवार, 2 अक्टूबर 2025

अध्याय 8 : भगवत्प्राप्ति (श्लोक 8 . 13)









अध्याय 8 : भगवत्प्राप्ति

श्लोक 8 . 13


ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। 

यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्॥८- १३॥


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

After being situated in this yoga practice and vibrating the sacred syllable oṁ, the supreme combination of letters, if one thinks of the Supreme Personality of Godhead and quits his body, he will certainly reach the spiritual planets.


भावार्थ

इस योगाभ्यास में स्थित होकर तथा अक्षरों के परं संयोग यानी ओंकार का उच्चारण करते हुए यदि कोई भगवान् का चिन्तन करता है और अपने शरीर का त्याग करता है, तो वह निश्चित रूप से आध्यात्मिक लोकों को जाता है |


तात्पर्य 

यहाँ स्पष्ट उल्लेख हुआ है कि ओम्, ब्रह्म तथा भगवान् कृष्ण परस्पर भिन्न नहीं हैं | ओम्, कृष्ण की निर्विशेष ध्वनि है, लेकिन हरे कृष्ण में यह ओम् सन्निहित है | इस युग के लिए हरे कृष्ण मन्त्र जप की स्पष्ट संस्तुति है | अतः यदि कोई – हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे | हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे– इस मन्त्र का जप करते हुए शरीर त्यागता है तो वह अपने अभ्यास के गुणानुसार आध्यात्मिक लोकों में से किसी एक लोक को जाता है | कृष्ण के भक्त कृष्णलोक या गोलोक वृन्दावन को जाते हैं | सगुणवादियों के लिए आध्यात्मिक आकाश में अन्य लोक हैं, जिन्हें वैकुण्ठ लोक कहते हैं, किन्तु निर्विशेषवादी तो ब्रह्मज्योति में ही रह जाते हैं |