रविवार, 12 अक्टूबर 2025

अध्याय 8 : भगवत्प्राप्ति (श्लोक 8 . 23)

अध्याय 8 : भगवत्प्राप्ति

श्लोक 8 . 23


यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः |

प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ  २३ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

O best of the Bhāratas, I shall now explain to you the different times at which, passing away from this world, the yogī does or does not come back.


भावार्थ

हे भरतश्रेष्ठ! अब मैं उन विभिन्न कालों को बताऊँगा, जिनमें इस संसार से प्रयाण करने के बाद योगी पुनः आता है अथवा नहीं आता |


तात्पर्य

परमेश्र्वर के अनन्य, पूर्ण शरणागत भक्तों को इसकी चिन्ता नहीं रहती कि वे कब और किस तरह शरीर को त्यागेंगे | वे सब कुछ कृष्ण पर छोड़ देते हैं और इस तरह सरलतापूर्वक, प्रसन्नता सहित भगवद्धाम जाते हैं | किन्तु जो अनन्य भक्त नहीं हैं और कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा हठयोग जैसी आत्म-साक्षात्कार की विधियों पर आश्रित रहते हैं, उन्हें उपयुक्त समय में शरीर त्यागना होता है, जिससे वे आश्र्वस्त हो सकें कि इस जन्म-मृत्यु वाले संसार में उनको लौटना होगा या नहीं |


यदि योगी सिद्ध होता है तो वह इस जगत् से शरीर छोड़ने का समय तथा स्थान चुन सकता है | किन्तु यदि वह इतना पटु नहीं होता तो उसकी सफलता उसके अचानक शरीर त्याग के संयोग पर निर्भर करती है | भगवान् ने अगले श्लोक में ऐसे उचिओत अवसरों का वर्णन किया है कि कब मरने से कोई वापस नहीं आता | आचार्य बलदेव विद्याभूषण के अनुसार यहाँ पर संस्कृत के काल शब्द का प्रयोग काल के अधिष्ठाता देव के लिए हुआ है |