गुरुवार, 30 अक्टूबर 2025

अध्याय 9 : परम गुह्य ज्ञान (श्लोक 9 . 13)









अध्याय 9 : परम गुह्य ज्ञान

श्लोक 9 . 13


महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः |

भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्  १३ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

O son of Pṛthā, those who are not deluded, the great souls, are under the protection of the divine nature. They are fully engaged in devotional service because they know Me as the Supreme Personality of Godhead, original and inexhaustible.


भावार्थ

हे पार्थ! मोहमुक्त महात्माजन दैवी प्रकृति के संरक्षण में रहते हैं | वे पूर्णतः भक्ति में निमग्न रहते हैं क्योंकि वे मुझे आदि तथा अविनाशी भगवान् के रूप में जानते हैं |


तात्पर्य

इस श्लोक में महात्मा का वर्णन हुआ है | महात्मा का सबसे पहला लक्षण यह है कि वह दैवी प्रकृति में स्थित रहता है | वह भौतिक प्रकृति के अधीन नहीं होता और यह होता कैसे है? इसकी व्याख्या सातवें अध्याय में की गई है – जो भगवान् श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण करता है वह तुरन्त भौतिक प्रकृति के वश से मुक्त हो जाता है | यही वह पात्रता है | ज्योंही कोई भगवान् का शरणागत हो जाता है वह भौतिक प्रकृति के वश से मुक्त हो जाता है | यही मूलभूत सूत्र है | तटस्था शक्ति होने के कारण जीव ज्योंही भौतिक प्रकृति के वश से मुक्त होता है त्योंही वह आध्यात्मिक प्रकृति के निर्देशन में चला जाता है | आध्यात्मिक प्रकृति का निर्देशन ही दैवी प्रकृति कहलाती है | इस प्रकार से जब कोई भगवान् के शरणागत होता है तो उसे महात्मा पद की प्राप्ति होती है |


महात्मा अपने ध्यान को कृष्ण के अतिरिक्त अन्य किसी ओर नहीं ले जाता, क्योंकि वह भलीभाँति जानता है कि कृष्ण ही आदि परं पुरुष, समस्त कारणों के कारण हैं | इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है | ऐसा महात्मा अन्य महात्माओं या शुद्धभक्तों की संगति से प्रगति करता है | शुद्धभक्त तो कृष्ण के अन्य स्वरूपों, यथा चतुर्भुज महाविष्णु रूप से भी आकृष्ट नहीं होते | वे न तो कृष्ण के अन्य किसी रूप से आकृष्ट होते हैं, न ही वे देवताओं या मनुष्यों के किसी रूप की परवाह करते हैं | वे कृष्णभावनामृत में केवल कृष्ण का ध्यान करते हैं | वे कृष्णभावनामृत में निरन्तर भगवान् की अविचल सेवा में लगे रहते हैं |