गुरुवार, 9 अक्टूबर 2025

अध्याय 8 : भगवत्प्राप्ति (श्लोक 8 . 20)









अध्याय 8 : भगवत्प्राप्ति

श्लोक 8 . 20


परस्तस्मात्तु भावोSन्योSव्यक्तोSव्यक्तात्सनातनः |

यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति  २० 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

Yet there is another unmanifest nature, which is eternal and is transcendental to this manifested and unmanifested matter. It is supreme and is never annihilated. When all in this world is annihilated, that part remains as it is.


भावार्थ

इसके अतिरिक्त एक अन्य अव्यय प्रकृति है, जो शाश्र्वत है और इस व्यक्त तथा अव्यक्त पदार्थ से परे है | यह परा (श्रेष्ठ) और कभी न नाश होने वाली है | जब इस संसार का सब कुछ लय हो जाता है, तब भी उसका नाश नहीं होता |


तात्पर्य

कृष्ण की पराशक्ति दिव्य और शाश्र्वत है | यह उस भौतिक प्रकृति के समस्त परिवर्तनों से परे है, जो ब्रह्मा के दिन के समय व्यक्त और रात्रि के समय विनष्ट होती रहती है | कृष्ण की पराशक्ति भौतिक प्रकृति के गुण से सर्वथा विपरीत है | परा तथा अपरा प्रकृति की व्याख्या सातवें अध्याय में हुई है |