सोमवार, 3 नवंबर 2025

अध्याय 9 : परम गुह्य ज्ञान (श्लोक 9 . 17)









अध्याय 9 : परम गुह्य ज्ञान

श्लोक 9 . 17


पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः |

वेद्यं पवित्रम् ॐकार ऋक् साम यजुरेव च  १७ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

I am the father of this universe, the mother, the support and the grandsire. I am the object of knowledge, the purifier and the syllable oṁ. I am also the Ṛg, the Sāma and the Yajur Vedas.


भावार्थ

मैं इस ब्रह्माण्ड का पिता, माता, आश्रय तथा पितामह हूँ | मैं ज्ञेय (जानने योग्य), शुद्धिकर्ता तथा ओंकार हूँ | मैं ऋग्वेद, सामवेद तथा यजुर्वेद भी हूँ |


तात्पर्य

सारे चराचर विराट जगत की अभिव्यक्ति कृष्ण की शक्ति के विभिन्न कार्यकलापों से होती है | इस भौतिक जगत् में हम विभिन्न जीवों के साथ तरह-तरह के सम्बन्ध स्थापित करते हैं, जो कृष्ण की शक्ति के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं हैं | प्रकृति की सृष्टि में उनमें से कुछ हमारे माता, पिता के रूप में उत्पन्न होते हैं वे कृष्ण के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं | इस श्लोक में आए धाता शब्द का अर्थ स्त्रष्टा है | न केवल हमारे माता पिता कृष्ण के अंश रूप हैं, अपितु इनके स्त्रष्टा दादी तथा दादा कृष्ण हैं | वस्तुतः कोई भी जीव कृष्ण का अंश होने के कारण कृष्ण है | अतः सारे वेदों के लक्ष्य कृष्ण ही हैं | हम वेदों से जो भी जानना चाहते हैं वह कृष्ण को जानने की दिशा में होता है | जिस विषय से हमारी स्वाभाविक स्थिति शुद्ध होती है, वह कृष्ण है | इसी प्रकार जो जीव वैदिक नियमों को जानने के लिए जिज्ञासु रहता है, वह भी कृष्ण का अंश, अतः कृष्ण भी है | समस्त वैदिक मन्त्रों में ॐ शब्द, जिसे प्रणव कहा जाता है, एक दिव्य ध्वनि-कम्पन है और यह कृष्ण भी है | चूँकि चारों वेदों – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद में प्रणव या ओंकार प्रधान है, अतः इसे कृष्ण समझना चाहिए |