शनिवार, 8 नवंबर 2025

अध्याय 9 : परम गुह्य ज्ञान (श्लोक 9 . 22)









अध्याय 9 : परम गुह्य ज्ञान

श्लोक 9 . 22


अनन्याश्र्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्  २२ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

But those who always worship Me with exclusive devotion, meditating on My transcendental form – to them I carry what they lack, and I preserve what they have.


भावार्थ

किन्तु जो लोग अनन्यभाव से मेरे दिव्यस्वरूप का ध्यान करते हुए निरन्तर मेरी पूजा करते हैं, उनकी जो आवश्यकताएँ होती हैं, उन्हें मैं पूरा करता हूँ और जो कुछ उनके पास है, उसकी रक्षा करता हूँ |


तात्पर्य

जो एक क्षण भी कृष्णभावनामृत के बिना नहीं रह सकता, वह चौबीस घण्टे कृष्ण का चिन्तन करता है और श्रवण, कीर्तन, स्मरण पादसेवन, वन्दन, अर्चन, दास्य, सख्यभाव तथा आत्मनिवेदन के द्वारा भगवान् के चरणकमलों की सेवा में रत रहता है | ऐसे कार्य शुभ होते हैं और आध्यात्मिक शक्ति से पूर्ण होते हैं, जिससे भक्त को आत्म-साक्षात्कार होता है और उसकी यही एकमात्र कामना रहती है कि वह भगवान् का सान्निध्य प्राप्त करे | ऐसा भक्त निश्चित रूप से बिना किसी कठिनाई के भगवान् के पास पहुँचता है | यह योग कहलाता है | ऐसा भक्त भगवत्कृपा से इस संसार में पुनः नहीं आता | क्षेम का अर्थ है भगवान् द्वारा कृपामय संरक्षण | भगवान् योग द्वारा पूर्णतया कृष्णभावनाभावित होने में सहायक बनते हैं और जब भक्त पूर्ण कृष्णभावनाभावित हो जाता है तो भगवान् उसे दुखमय बद्धजीवन में फिर से गिरने से उसकी रक्षा करते हैं |