गुरुवार, 13 नवंबर 2025

अध्याय 9 : परम गुह्य ज्ञान (श्लोक 9 . 26)












अध्याय 9 : परम गुह्य ज्ञान

श्लोक 9 . 26


पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति |

तदहं भक्तयुपहृतमश्र्नामि प्रयतात्मनः  २६ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

If one offers Me with love and devotion a leaf, a flower, a fruit or water, I will accept it.


भावार्थ

यदि कोई प्रेम तथा भक्ति के साथ मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल प्रदान करता है, तो मैं उसे स्वीकार करता हूँ |


तात्पर्य

नित्य सुख के लिए स्थायी, आनन्दमय धाम प्राप्त करने हेतु बुद्धिमान व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य है कि वह कृष्णभावनाभावित होकर भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में तत्पर रहे | ऐसा आश्चर्यमय फल प्राप्त करने की विधि इतनी सरल है की निर्धन से निर्धन व्यक्ति को योग्यता का विचार किये बिना इसे पाने का प्रयास करना चाहिए | इसके लिए एकमात्र योग्यता इतनी ही है कि वह भगवान् का शुद्धभक्त हो | इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि कोई क्या है और कहाँ स्थित है | यह विधि इतनी सरल है कि यदि प्रेमपूर्वक एक पत्ती, थोड़ा सा जल या फल ही भगवान् को अर्पित किया जाता है तो भगवान् उसे सहर्ष स्वीकार करते हैं | अतः किसी को भी कृष्णभावनामृत से रोका नहीं जा सकता, क्योंकि यह सरल है और व्यापक है | ऐसा कौन मुर्ख होगा जो इस सरल विधि से कृष्णभावनाभावित नहीं होना चाहेगा और सच्चिदानन्दमय जीवन की परम सिद्धि नहीं चाहेगा? कृष्ण को केवल प्रेमाभक्ति चाहिए और कुछ भी नहीं | कृष्ण तो अपने शुद्धभक्त से एक छोटा सा फूल तक ग्रहण करते हैं | किन्तु अभक्त से वे कोई भेंट नहीं चाहते | उन्हें किसी से कुछ भी नहीं चाहिए, क्योंकि वे आत्मतुष्ट हैं, तो भी वे अपने भक्त की भेंट प्रेम तथा स्नेह के विनिमय मे स्वीकार करते हैं | कृष्णभावनामृत विकसित करना जीवन का चरमलक्ष्य है | इस श्लोक मे भक्ति शब्द का उल्लेख दो बार यह करने के लिए हुआ है कि भक्ति ही कृष्ण के पास पहुँचने का एकमात्र साधन है | किसी अन्य शर्त से, यथा ब्राह्मण, विद्वान, धनी या महान विचारक होने से, कृष्ण किसी प्रकार कि भेंट लेने को तैयार नहीं होते | भक्ति ही मूलसिद्धान्त है, जिसके बिना वे किसी से कुछ भी लेने के लिए प्रेरित नहीं किये जा सकते | भक्ति कभी हैतुकी नहीं होती | यह शाश्र्वत विधि है | यह परब्रह्म की सेवा में प्रत्यक्ष कर्म है |