गुरुवार, 20 नवंबर 2025

अध्याय 9 : परम गुह्य ज्ञान (श्लोक 9 . 33)









अध्याय 9 : परम गुह्य ज्ञान

श्लोक 9 . 33


किंपुनर्ब्राह्मणाःपुण्याभक्ताराजर्षयस्तथा |

अनित्यमसुखंलोकमिमंप्राप्यभजस्वमाम्  ३३ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

How much more this is so of the righteous brāhmaṇas, the devotees and the saintly kings. Therefore, having come to this temporary, miserable world, engage in loving service unto Me.


भावार्थ

फिर धर्मात्मा ब्राह्मणों, भक्तों तथा राजर्षियों के लिए तो कहना ही क्या है! अतः इस क्षणिक दुखमय संसार में आ जाने पर मेरी प्रेमाभक्ति में अपने आपको लगाओ |


तात्पर्य

इस संसार में कई श्रेणियों के लोग हैं, किन्तु तो भी यह संसार किसी के लिए सुखमय स्थान नहीं है | यहाँ स्पष्ट कहा गया है – अनित्यम् असुखं लोकम् – यह जगत् अनित्य तथा दुखमय है और किसी भी भले मनुष्य के रहने लायक नहीं है | भगवान् इस संसार को क्षणिक तथा दुखमय घोषित कर रहे हैं | कुछ दार्शनिक, विशेष रूप से मायावादी, कहते हैं कि यह संसार मिथ्या है, किन्तु भगवद्गीता से हम यह जान सकते हैं कि यह संसार मिथ्या नहीं है, यह अनित्य है | अनित्य तथा मिथ्या में अन्तर है | यह संसार अनित्य है, किन्तु एक दूसरा भी संसार है जो नित्य है | यह संसार दुखमय है, किन्तु दूसरा संसार नित्य तथा आनन्दमय है |

.

अर्जुन का जन्म ऋषितुल्य राजकुल में हुआ था | अतः भगवान् उससे भी कहते हैं, “मेरी सेवा करो, और शीघ्र ही मेरे धाम को प्राप्त करो |” किसी को भी इस अनित्य संसार में नहीं रहना चाहिए, क्योंकि यह दुखमय है | प्रत्येक व्यक्ति को भगवान् के हृदय से लगना चाहिए, जिससे वह सदैव सुखी रह सके | भगवद्भक्ति ही एकमात्र ऐसी विधि है जिसके द्वारा सभी वर्गों के लोगों की सारी समस्याएँ सुलझाई जा सकती हैं | अतः प्रत्येक व्यक्ति को कृष्णभावनामृत स्वीकार करके अपने जीवन को सफल बनाना चाहिए |