मंगलवार, 18 नवंबर 2025

अध्याय 9 : परम गुह्य ज्ञान (श्लोक 9 . 31)












अध्याय 9 : परम गुह्य ज्ञान

श्लोक 9 . 31


क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्र्वच्छान्तिं निगच्छति |

कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति  ३१ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

He quickly becomes righteous and attains lasting peace. O son of Kuntī, declare it boldly that My devotee never perishes.


भावार्थ

वह तुरन्त धर्मात्मा बन जाता है और स्थायी शान्ति को प्राप्त होता है | हे कुन्तीपुत्र! निडर होकर घोषणा कर दो कि मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता है |


तात्पर्य

इसका कोई दूसरा अर्थ नहीं लगाना चाहिए | सातवें अध्याय में भगवान् कहते हैं कि जो दुष्कृती है, वह भगवद्भक्त नहीं हो सकता | जो भगवद्भक्त नहीं है, उसमें कोई भी योग्यता नहीं होती | तब प्रश्न यह उठता है कि संयोगवश या स्वेच्छा से निन्दनीय कर्मों में प्रवृत्त होने वाला व्यक्ति किस प्रकार भक्त हो सकता है ? यह प्रश्न ठीक ही है | जैसा कि सातवें अध्याय में कहा गया है, जो दुष्टात्मा कभी भक्ति के पास नहीं फटकता, उसमें कोई सद्गुण नहीं होते | श्रीमद्भागवत में भी इसका उल्लेख है | सामान्यतया नौ प्रकार के भक्ति-कार्यों में युक्त रहने वाला भक्त अपने हृदय में बसाता है, फलतः उसके सारे पापपूर्ण कल्मष धुल जाते हैं | निरन्तर भगवान् का चिन्तन करने से वह स्वतः शुद्ध हो जाता है | वेदों के अनुसार ऐसा निधान है कि यदि कोई अपने उच्चपद से नीचे गिर जाता है तो अपनी शुद्धि के लिए उसे कुछ अनुष्ठान करने होते हैं | किन्तु यहाँ पर ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं है, क्योंकि शुद्धि की क्रिया भगवान् का निरन्तर स्मरण करते रहने से पहले ही भक्त के हृदय में चलति रहती है | अतः हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे | हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे – इस मन्त्र का अनवरत जप करना चाहिए | यह भक्त को आकस्मिक पतन से बचाएगा | इस प्रकार वह समस्त भौतिक कल्मषों से सदैव मुक्त रहेगा |