अध्याय 11 : विराट रूप
श्लोक 11.33
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रुन्भुंक्ष्व राज्यं समृद्धम् |
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भाव सव्यसाचिन् ३३
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
Therefore get up. Prepare to fight and win glory. Conquer your enemies and enjoy a flourishing kingdom. They are already put to death by My arrangement, and you, O Savyasācī, can be but an instrument in the fight.
भावार्थ
अतः उठो! लड़ने के लिएतैयार होओ और यश अर्जित करो | अपने शत्रुओं को जीतकर सम्पन्न राज्य का भोग करो |ये सब मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं और हे सव्यसाची! तुम तो युद्ध मेंकेवल निमित्तमात्र हो सकते हो |
तात्पर्य
सव्यसाची का अर्थ है वह जो युद्धभूमि में अत्यन्त कौशल के साथ तीर छोड़ सके | इस प्रकार अर्जुनको एक पटु योद्धा के रूप में सम्बोधित किया गया है, जो अपने शत्रुओं को तीर सेमारकर मौत के घाट उतार सकता है | निमित्तमात्रम् – “केवल कारण मात्र” यह शब्द भीअत्यन्त महत्त्वपूर्ण है | संसार भगवान् की इच्छानुसार गतिमान है | अल्पज्ञ पुरुषसोचते हैं कि प्रकृति बिना किसी योजना के गतिशील है और सारी सृष्टि आकस्मिक है |ऐसा अनेक तथाकथित विज्ञानी हैं, जो यह सुझाव रखते हैं कि सम्भवतया ऐसा था, या ऐसाहओ सकता है, किन्तु इस प्रकार के “शायद” या “हो सकता है” का प्रश्न ही नहीं उठता | प्रकृति द्वारा विशेष योजना संचालित की जा रही है | यह योजना क्या है? यह विराट जगत् बद्धजीवों के लिए भगवान् के धाम वापस जाने के लिए सुअवसर (सुयोग) है | जब तकउनकी प्रवृत्ति प्रकृति के ऊपर प्रभुत्व स्थापित करने की रहती है, तब तक वे बद्धरहते हैं | किन्तु जो कोई भी परमेश्र्वर की इस योजना (इच्छा) को समझ लेता है औरकृष्णभावनामृत का अनुशीलन करता है, वह परम बुद्धिमान है | दृश्यजगत की उत्पत्तितथा उसका संहार ईश्र्वर की परम अध्यक्षता में होता है | इस प्रकार कुरुक्षेत्र कायुद्ध ईश्र्वर की योजना के अनुसार लड़ा गया | अर्जुन युद्ध करने से मना कर रहा था,किन्तु उसे बताया गया कि परमेश्र्वर की इच्छानुसार उसे लड़ना होगा | तभी वह सुखीहोगा | यदि कोई कृष्णभावनामृत से पूरित हो और उसका जीवन भगवान् की दिव्य सेवा में अर्पित हो, तो समझो कि वह कृतार्थ है |
