सोमवार, 6 अप्रैल 2026

अध्याय 11 : विराट रूप (श्लोक 11.35)









अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11.35


सञ्जय उवाच |

एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीती |

नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य  ३५ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

Sañjaya said to Dhṛtarāṣṭra: O King, after hearing these words from the Supreme Personality of Godhead, the trembling Arjuna offered obeisances with folded hands again and again. He fearfully spoke to Lord Kṛṣṇa in a faltering voice, as follows.


भावार्थ

संजय ने धृतराष्ट्र से कहा- हे राजा! भगवान् के मुख से इन वचनों कोसुनकर काँपते हुए अर्जुन ने हाथ जोड़कर उन्हें बारम्बार नमस्कार किया | फिर उसनेभयभीत होकर अवरुद्ध स्वर में कृष्ण से इस प्रकार कहा |


तात्पर्य

जैसा कि पहले कहा जा चुका है, भगवान् के विश्र्वरूप के कारण अर्जुन आश्चर्यचकित था, अतः वह कृष्ण को बारम्बार नमस्कार करने लगा और अवरुद्ध कंठ से आश्चर्य से वह कृष्ण की प्रार्थना मित्र के रूप में नहीं, अपितु भक्त के रूप में करने लगा |