मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

अध्याय 11 : विराट रूप (श्लोक 11.36)









अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11.36


अर्जुन उवाच |

स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च |

रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः  ३६ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

Arjuna said: O master of the senses, the world becomes joyful upon hearing Your name, and thus everyone becomes attached to You. Although the perfected beings offer You their respectful homage, the demons are afraid, and they flee here and there. All this is rightly done.


भावार्थ

अर्जुन ने कहा – हे हृषिकेश! आपके नाम के श्रवण से संसार हर्षित होताहै और सभी लोग आपके प्रति अनुरक्त होते हैं | यद्यपि सिद्धपुरुष आपको नमस्कार करतेहैं, किन्तु असुरगण भयभीत हैं और इधर-उधर भाग रहे हैं | यह ठीक ही हुआ है |


तात्पर्य

कृष्ण से कुरुक्षेत्र युद्ध के परिणाम को सुनकर स्र्जुन प्रवृद्ध हओगया और भगवान् के परम भक्त तथा मित्र के रूप में उनसे बोला कि कृष्ण जो कुछ करतेहैं, वह सब उचित है | अर्जुन ने पुष्टि की कि कृष्ण ही पालक हैं और भक्तों केआराध्य तथा अवांछित तत्त्वों के संहारकर्ता हैं | उनके सारे कार्य सबों के लिएसमान रूप से शुभ होते हैं | यहाँ पर अर्जुन यह समझ पाता है कि जब युद्ध निश्चितरूप से होने था तो अन्तरिक्ष से अनेक देवता, सिद्ध तथा उच्चतर लोकों के बुद्धिमानप्राणी युद्ध को देख रहे थे, क्योंकि युद्ध में कृष्ण उपस्थित थे | जब अर्जुन नेभगवान् का विश्र्वरूप देखा तो देवताओं को आनन्द हुआ, किन्तु अन्य लोग जो असुर तथानास्तिक थे, भगवान् की प्रशंसा सुनकर सहन ण कर सके | वे भगवान् के विनाशकारी रूपसे डर कर भाग गये | भक्तों तथा नास्तिकों के प्रति भगवान् के व्यवहार की अर्जुनद्वारा प्रशंसा की गई है | भक्त प्रत्येक अवस्था में भगवान् का गुणगान करता है,क्योंकि वह जानता है कि वे जो कुछ भी करते हैं, वह सबों के हित में है |