रविवार, 12 अप्रैल 2026

अध्याय 11 : विराट रूप (श्लोक 11.41 - 42)









अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11.41 - 42


सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति |

अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि  ४१ 


यच्चावहासार्थमसत्कृतोSसि विहारशय्यासनभोजनेषु |

एकोSथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्  ४२ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

Thinking of You as my friend, I have rashly addressed You “O Kṛṣṇa,” “O Yādava,” “O my friend,” not knowing Your glories. Please forgive whatever I may have done in madness or in love. I have dishonored You many times, jesting as we relaxed, lay on the same bed, or sat or ate together, sometimes alone and sometimes in front of many friends. O infallible one, please excuse me for all those offenses.


भावार्थ

आपको अपना मित्र मानते हुए मैंने हठपूर्वक आपको हे कृष्ण, हे यादव, हेसखा जैसे सम्बोधनों से पुकारा है, क्योंकि मैं आपकी महिमा को नहीं जानता था |मैंने मूर्खतावश या प्रेमवश जो कुछ भी किया है, कृपया उसके लिए मुझे क्षमा कर दें| यही नहीं, मैंने कई बार आराम करते समय, एकसाथ लेटे हुए या साथ-साथ खाते या बैठेहुए, कभी अकेले तो कभी अनेक मित्रों के समक्ष आपका अनादर किया है | हे अच्युत!मेरे इन समस्त अपराधों को क्षमा करें |


तात्पर्य

यद्यपि अर्जुन के समक्ष कृष्ण अपने विराट रूप में हैं,किन्तु उसे कृष्ण के साथ अपना मैत्रीभाव स्मरण है | इसीलिए वह मित्रता के कारणहोने वाले अनेक अपराधों को क्षमा करने के लिए प्रार्थना कर रहा है | वह स्वीकारकरता है कि पहले उसे ज्ञात ण था कि कृष्ण ऐसा विराट रूप धारण कर सकते हैं, यद्यपिमित्र के रूप में कृष्ण ने उसे यह समझाया था | अर्जुन को यह भी पता नहीं था किउसने कितनी बार ‘हे मेरे मित्र’ ‘हे कृष्ण’ ‘हे यादव’ जैसे सम्बोधनों के द्वाराउनका अनादर किया है और उनकी महिमा स्वीकार नहीं की | किन्तु कृष्ण इतने कृपालु हैंकि इतने ऐश्र्वर्यमण्डित होने पर भी अर्जुन से मित्र की भूमिका निभाते रहे | ऐसाहोता है भक्त तथा भगवान् के बीच दिव्य प्रेम का आदान-प्रदान | जीव तथा कृष्ण कासम्बन्ध शाश्र्वत रूप से स्थिर है, इसे भुलाया नहीं जा सकता, जैसा कि हम अर्जुन केआचरण में देखते हैं | यद्यपि अर्जुन विराट रूप का ऐश्र्वर्य देख चुका है, किन्तुवह कृष्ण के साथ अपनी मैत्री नहीं भूल सकता |