शनिवार, 11 अप्रैल 2026

अध्याय 11 : विराट रूप (श्लोक 11.40)









अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11.40


नमः पुरस्तादथ पृष्ठस्ते नमोSस्तु ते सर्वत एव सर्व |

अनन्तवीर्यामीतविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोSसि सर्वः  ४० 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

Obeisances to You from the front, from behind and from all sides! O unbounded power, You are the master of limitless might! You are all-pervading, and thus You are everything!


भावार्थ

आपको आगे, पीछे, तथा चारों ओर से नमस्कार है | हे असीम शक्ति! आपअनन्त पराक्रम के स्वामी हैं | आप सर्वव्यापी हैं, अतः आप सब कुछ हैं |


तात्पर्य

कृष्ण के प्रेम से अभिभूत उनका मित्र अर्जुन सभी दिशाओं सेउनको नमस्कार कर रहा है | वह स्वीकार करता है कि कृष्ण समस्त बल तथा पराक्रम केस्वामी हैं और युद्धभूमि में एकत्र समस्त योद्धाओं से कहीं अधिक श्रेष्ठ हैं |विष्णुपुराण में (१.९.६९) कहा गया है –

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योऽयं तवागतो देव समीपं देवतागणः |

स त्वमेव जगत्स्त्रष्टा यतः सर्वगतो भवान् ||

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“आपके समक्ष जो भी आता है, चाहे वह देवता ही क्यों ण हओ, हे भगवान्!वह आपके द्वारा ही उत्पन्न है |”