रविवार, 3 मई 2026

अध्याय 12 : भक्तियोग (श्लोक 12.8)








अध्याय 12 : भक्तियोग

श्लोक 12.8


मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेश्य |

निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः  ८ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

Just fix your mind upon Me, the Supreme Personality of Godhead, and engage all your intelligence in Me. Thus you will live in Me always, without a doubt.


भावार्थ

मुझ भगवान् में अपने चित्त को स्थिर करो और अपनी साड़ी बुद्धि मुझमें लगाओ | इस प्रकार तुम निस्सन्देह मुझमें सदैव वास करोगे |


तात्पर्य

जो भगवान् कृष्ण की भक्ति में रत रहता है, उसका परमेश्र्वर के साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है | अतएव इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं कि प्रारम्भ से ही उसकी स्थिति दिव्य होती है | भक्त कभी भौतिक धरातल पर नहीं रहता - वह सदैव कृष्ण में वास करता है | भगवान् का पवित्र नाम तथा भगवान् अभिन्न हैं | अतः जब भक्त हरे कृष्ण कीर्तन करता है, तो कृष्ण तथा उनकी अन्तरंगाशक्ति भक्त की जिह्वा पर नाचते रहते हैं | जब वह कृष्ण को भोग चढ़ाता है, जो कृष्ण प्रत्यक्ष रूप से ग्रहण करते हैं और इस तरह इस अच्चिष्ट (जूठन) को खाकर कृष्णमाय हो जाता है | जो इस प्रकार सेवा में ही नहीं लगता, वह नहीं समझ पाता कि यह सब कैसे होता है, यद्यपि भगवद्गीता तथा अन्य वैदिक ग्रंथों में इसी विधि की संस्तुति की गई है |