शुक्रवार, 29 मई 2026

अध्याय 13 : प्रकृति, पुरुष तथा चेतना (श्लोक 13.20)









अध्याय 13 : प्रकृति, पुरुष तथा चेतना

श्लोक 13.20


प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्धयनादी उभावपि |

विकारांश्र्च गुणांश्र्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्  २० 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

Material nature and the living entities should be understood to be beginningless. Their transformations and the modes of matter are products of material nature.


भावार्थ

प्रकृति तथा जीवों को अनादि समझना चाहिए | उनके विकार तथा गुण प्रकृतिजन्य हैं |


तात्पर्य

इस अध्याय के ज्ञान से मनुष्य शरीर (क्षेत्र) तथा शरीर के ज्ञाता (जीवात्मा तथा परमात्मा दोनों) को जान सकता है | शरीर क्रियाक्षेत्र है और प्रकृति से निर्मित है | शरीर के भीतर बद्ध तथा उसके कार्यों का भोग करने वाला आत्मा ही पुरुष या जीव है | वह ज्ञाता है और इसके अतिरिक्त भी दूसरा ज्ञाता होता है, जो परमात्मा है | निस्सन्देह यह समझना चाहिए कि परमात्मा तथा आत्मा एक ही भगवान् की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं | जीवात्मा उनकी शक्ति है और परमात्मा उनका साक्षात् अंश (स्वांश) है |


प्रकृति तथा जीव दोनों ही नित्य हैं | तात्पर्य यह है कि वे सृष्टि से पहले से विद्यमान हैं | यह भौतिक अभिव्यक्ति परमेश्र्वर की शक्ति से है, और उसी प्रकार जीव भी हैं, किन्तु जीव श्रेष्ठ शक्ति है | जीव तथा प्रकृति इस ब्रह्माण्ड के उत्पन्न होने से पूर्व से विद्यमान हैं | प्रकृति तो महाविष्णु में लीन हो गई और जब इसकी आवश्यकता पड़ी तो यह महत्-तत्त्व के द्वारा प्रकट हुई | इसी प्रकार जीव भी उनके भीतर रहते हैं, और चूँकि वे बद्ध हैं, अतएव वे परमेश्र्वर की सेवा करने से विमुख हैं | इस तरह उन्हें वैकुण्ठ-लोक में प्रविष्ट होने नहीं दिया जाता | लेकिन प्रकृति के व्यक्त होने पर इन्हें भौतिक जगत् में पुनः कर्म करने और वैकुण्ठ-लोक में प्रवेश करने की तैयारी करने का अवसर दिया जाता है | इस भौतिक सृष्टि का यही रहस्य है | वास्तव में जीवात्मा मूलतः परमेश्र्वर का अंश है, लेकिन अपने विद्रोही स्वभाव के कारण वह प्रकृति के भीतर बद्ध रहता है | इसका कोई महत्त्व नहीं है कि ये जीव या श्रेष्ठ जीव किस प्रकार प्रकृति के सम्पर्क में आये | किन्तु भगवान् जानते हैं कि ऐसा कैसे और क्यों हुआ | शास्त्रों में भगवान् का वचन है कि जो लोग प्रकृति द्वारा आकृष्ट हैं, वे कठिन जीवन-संघर्ष कर रहे हैं | लेकिन इस कुछ श्लोकों के वर्णनों से यह निश्चित समझ लेना होगा कि प्रकृति के तीन गुणों के द्वारा उत्पन्न विकार प्रकृति की ही उपज हैं | जीवों के सारे विकार तथा प्रकार शरीर के कारण हैं | जहाँ तक आत्मा का सम्बन्ध है, सारे जीव एक ही हैं |