शुक्रवार, 1 अगस्त 2025

अध्याय 6 : ध्यानयोग (श्लोक 6 . 26)












अध्याय 6 : ध्यानयोग

श्लोक 6 . 26


यतो यतो निश्र्चलति मनश्र्चञ्चलमस्थिरम् |

ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्  २६ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

From wherever the mind wanders due to its flickering and unsteady nature, one must certainly withdraw it and bring it back under the control of the Self.


भावार्थ

मन अपनी चंचलता तथा अस्थिरता के कारण जहाँ कहीं भी विचरण करता हो,मनुष्य को चाहिए कि उसे वहाँ से खींचे और अपने वश में लाए |


तात्पर्य

मन स्वभाव से चंचल और अस्थिर है | किन्तु स्वरुपसिद्ध योगी को मन को वश में लाना होता है, उस पर मन का धिकार नहीं होना चाहिए | जो मन को (तथा इन्द्रियों को भी) वश में रखता है, वह गोस्वामी या स्वामी कहलाता है और जो मन के वशीभूत होता है वह गोदास अर्थात् इन्द्रियों का सेवक कहलाता है | गोस्वामी इन्द्रियसुख के मानक से भिज्ञ होता है | दिव्य इन्द्रियसुख वह है जिसमें इन्द्रियाँ हृषिकेश अर्थात् इन्द्रियों के स्वामी भगवान् कृष्ण की सेवा में लगी रहती हैं | शुद्ध इन्द्रियों के द्वारा कृष्ण की सेवा ही कृष्णचेतना या कृष्णभावनामृत कहलाती है | इन्द्रियों को पूर्णवश में लाने की यही विधि है | इससे भी बढ़कर बात यह है कि यह योगाभ्यास की परम सिद्धि भी है |