शनिवार, 2 अगस्त 2025

अध्याय 6 : ध्यानयोग (श्लोक 6 . 27)









अध्याय 6 : ध्यानयोग

श्लोक 6 . 27


प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम् |

उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्  २७ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

The yogī whose mind is fixed on Me verily attains the highest perfection of transcendental happiness. He is beyond the mode of passion, he realizes his qualitative identity with the Supreme, and thus he is freed from all reactions to past deeds.


भावार्थ

जिस योगी का मन मुझ में स्थिर रहता है, वह निश्चय ही दिव्यसुख की सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त करता है | वह रजोगुण से परे हो जाता है, वह परमात्मा के साथ अपनी गुणात्मक एकता को समझता है और इस प्रकार अपने समस्त विगत कर्मों के फल से निवृत्त हो जाता है |


तात्पर्य

ब्रह्मभूत वह अवस्था है जिसमें भौतिक कल्मष से मुक्त होकर भगवान् की दिव्यसेवा में स्थित हुआ जाता है | मद्भक्तिं लभते पराम् (भगवद्गीता १८.५४) | जब तक मनुष्य का मन भगवान् के चरणकमलों में स्थिर नहीं हो जाता तब तक कोई ब्रह्मरूप में नहीं रह सकता | स वै मनः कृष्णपदारविन्दयोः | भगवान् की दिव्य प्रेमभक्ति में निरन्तर प्रवृत्त रहना या कृष्णभावनामृत में रहना वस्तुतः रजोगुण तथा भौतिक कल्मष से मुक्त होना है |