शनिवार, 30 अगस्त 2025

अध्याय 7 : भगवद्ज्ञान (श्लोक 7 . 9)












अध्याय 7 : भगवद्ज्ञान

श्लोक 7 . 9


पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्र्चास्मि विभावसौ |

जीवनं सर्वभूतेषु तपश्र्चास्मि तपस्विषु  ९ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

I am the original fragrance of the earth, and I am the heat in fire. I am the life of all that lives, and I am the penances of all ascetics.


भावार्थ

मैं पृथ्वी की आद्य सुगंध और अग्नि की ऊष्मा हूँ | मैं समस्त जीवों का जीवन तथा तपस्वियों का तप हूँ |


तात्पर्य

पुण्य का अर्थ है – जिसमें विकार न हो, अतः आद्य | इस जगत में प्रत्येक वस्तु में कोई न कोई सुगंध होती है, यथा फूल की सुगंध या जल, पृथ्वी, अग्नि, वायु आदि की सुगंध | समस्त वस्तुओं में व्याप्त अदूषित भौतिक गन्ध, जो आद्य सुगंध है, वह कृष्ण हैं | इसी प्रकार प्रत्येक वस्तु का एक विशिष्ट स्वाद (रस) होता है और इस स्वाद को रसायनों के मिश्रण द्वारा बदला जा सकता है | अतः प्रत्येक मूल वस्तु में कोई न कोई गन्ध तथा स्वाद होता है | विभावसु का अर्थ अग्नि है | अग्नि के बिना न तो फैक्टरी चल सकती है, न भोजन पाक सकता है | यह अग्नि कृष्ण है | अग्नि का तेज (ऊष्मा) भी कृष्ण ही है | वैदिक चिकित्सा के अनुसार कुपच का करण पेट में अग्नि की मंदता है | अतः पाचन तक के लिए अग्नि आवश्यक है | कृष्णभावनामृत में हम इस वाट से अवगत होते हैं कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु तथा प्रत्येक सक्रीय तत्त्व, सारे रसायन तथा सारे भौतिक तत्त्व कृष्ण के कारण हैं | मनुष्य की आयु भी कृष्ण के करण है | अतः कृष्ण कृपा से ही मनुष्य अपने को दीर्घालु या अल्पजीवी बना सकता है | अतः कृष्णभावनामृत प्रत्येक क्षेत्र में सक्रीय रहता है |