रविवार, 10 अगस्त 2025

अध्याय 6 : ध्यानयोग (श्लोक 6 . 36)









अध्याय 6 : ध्यानयोग

श्लोक 6 . 36


असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः |

वश्यात्मना तु यतता शक्योSवाप्तुमुपायतः  ३६ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

For one whose mind is unbridled, self-realization is difficult work. But he whose mind is controlled and who strives by appropriate means is assured of success. That is My opinion.


भावार्थ

जिसका मन उच्छृंखल है, उसके लिए आत्म-साक्षात्कार कठिन कार्य होता है, किन्तु जिसका मन संयमित है और जो समुचित उपाय करता है उसकी सफलता ध्रुव है | ऐसा मेरा मत है |


तात्पर्य

भगवान् घोषणा करते हैं कि जो व्यक्ति मन को भौतिक व्यापारों से विलग करने का समुचित उपचार नहीं करता, उसे आत्म-साक्षात्कार में शायद ही सफलता प्राप्त हो सके | भौतिक भोग में मन लगाकर योग का अभ्यास करना मानो अग्नि में जल डाल कर उसे प्रज्ज्वलित करने का प्रयास करना हो | मन का निग्रह किये बिना योगाभ्यास समय का अपव्यय है | योग का ऐसा प्रदर्शन भले ही भौतिक दृष्टि से लाभप्रद हो, किन्तु जहाँ तक आत्म-साक्षात्कार का प्रश्न है यह सब व्यर्थ है | अतः मनुष्य को चाहिए कि भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में निरन्तर मन को लगाकर उसे वश में करे | कृष्णभावनामृत में प्रवृत्त हुए बिना मन को स्थिर कर पाना असम्भव है | कृष्णभावनाभावित व्यक्ति बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के ही योगाभ्यास का फल सरलता से प्राप्त कर लेता है, किन्तु योगाभ्यास करने वाले को कृष्णभावनाभावित हुए बिना सफलता नहीं मिल पाती |