शनिवार, 23 अगस्त 2025

अध्याय 7 : भगवद्ज्ञान (श्लोक 7 . 2)









अध्याय 7 : भगवद्ज्ञान

श्लोक 7 . 2


ज्ञानं तेSहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः | 

यज्ज्ञात्वा नेह भूयोSन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते  २ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

I shall now declare unto you in full this knowledge, both phenomenal and numinous. This being known, nothing further shall remain for you to know.


भावार्थ

अब मैं तुमसे पूर्णरूप से व्यावहारिक तथा दिव्यज्ञान कहूँगा | इसे जान लेने पर तुम्हें जानने के लिए और कुछ भी शेष नहीं रहेगा |


तात्पर्य

पूर्णज्ञान में प्रत्यक्ष जगत्, इसके पीछे काम करने वाला आत्मा तथा इन दोनों के उद्गम सम्मिलित हैं | यह दिव्यज्ञान है | भगवान् उपर्युक्त ज्ञानपद्धति बताना चाहते हैं, क्योंकि अर्जुन उनका विश्र्वस्त भक्त तथा मित्र है | चतुर्थ अध्याय के प्रारम्भ में इसकी व्याख्या भगवान् कृष्ण ने की और उसी की पुष्टि यहाँ पर हो रही है | भगवद्भक्त द्वारा पूर्णज्ञान का लाभ भगवान् से प्रारम्भ होने वाली गुरु-परम्परा से ही किया जा सकता है | अतः मनुष्य को इतना बुद्धिमान तो होना ही चाहिए कि वह समस्त ज्ञान के अद्गम को जान सके, जो समस्त कारणों के करण है और समस्त योगों में ध्यान का एकमात्र लक्ष्य है | जब समस्त कारणों के कारण का पता चल जाता है, तो सभी ज्ञेय वस्तुएँ ज्ञात हो जाती हैं और कुछ भी अज्ञेय नहीं रह जाता | वेदों का (मुण्डक उपनिषद् १.३) कहना है – कस्मिन् भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति |