शनिवार, 14 मार्च 2026

अध्याय 11 : विराट रूप (श्लोक 11 .21)









अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11 .21


अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति

केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति |

स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः

स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः  २१ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

All the hosts of demigods are surrendering before You and entering into You. Some of them, very much afraid, are offering prayers with folded hands. Hosts of great sages and perfected beings, crying “All peace!” are praying to You by singing the Vedic hymns.


भावार्थ

देवों का सारा समूह आपकी शरण ले रहा है और आपमें प्रवेश कर रहा है |उनमें से कुछ अत्यन्त भयभीत होकर हाथ जोड़े आपकी प्रार्थना कर रहें हैं | महर्षियोंतथा सिद्धों के समूह “कल्याण हो” कहकर वैदिक स्तोत्रों का पाठ करते हुए आपकीस्तुति कर रहे हैं |


तात्पर्य

समस्त लोकों के देवता विश्र्वरूप कि भयानकता तथा प्रदीप्ततेज से इतने भयभीत थे कि वे रक्षा के लिए प्रार्थना करने लगे |