मंगलवार, 17 मार्च 2026

अध्याय 11 : विराट रूप (श्लोक 11 .24)









अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11 .24


नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं

व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् |

दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा

धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो  २४ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

O all-pervading Viṣṇu, seeing You with Your many radiant colors touching the sky, Your gaping mouths, and Your great glowing eyes, my mind is perturbed by fear. I can no longer maintain my steadiness or equilibrium of mind.


भावार्थ

हे सर्वव्यापी विष्णु!नाना ज्योर्तिमय रंगोंसे युक्त आपको आकाश का स्पर्श करते, मुख फैलाये तथा बड़ी-बड़ी चमकती आँखें निकालेदेखकर भय से मेरा मन विचलित है | मैं न तो धैर्य धारण कर पा रहा हूँ, ण मानसिकसंतुलन ही पा रहा हूँ |