शुक्रवार, 13 मार्च 2026

अध्याय 11 : विराट रूप (श्लोक 11 .20)









अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11 .20


द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि 

व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्र्च सर्वाः | 

दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं 

लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्  २० 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

Although You are one, You spread throughout the sky and the planets and all space between. O great one, seeing this wondrous and terrible form, all the planetary systems are perturbed.


भावार्थ

यद्यपि आप एक हैं, किन्तु आप आकाश तथा सारे लोकों एवं उनके बीच के समस्त अवकाश में व्याप्त हैं | हे महापुरुष! आपके इस अद्भुत तथा भयानक रूप को देखके सारे लोक भयभीत हैं |


तात्पर्य

इस श्लोक में द्याव्-आ-पृथिव्योः (धरती तथा आकाश के बीच का स्थान) तथा लोकत्रयम् (तीनों संसार) महत्त्वपूर्ण शब्द हैं, क्योंकि ऐसा लगता है कि न केवल अर्जुन ने इस विश्र्वरूप को देखा, बल्कि अन्य लोकों के वासियों ने भी देखा | अर्जुन द्वारा विश्र्वरूप का दर्शन स्वप्न न था | भगवान् ने जिन जिनको दिव्य दृष्टि प्रदान की, उन्होंने युद्धक्षेत्र में उस विश्र्वरूप को देखा |