अध्याय 11 : विराट रूप
श्लोक 11 .29
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः |
तथैव नाशाय विशन्ति लोका-स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः २९
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
I see all people rushing full speed into Your mouths, as moths dash to destruction in a blazing fire.
भावार्थ
मैं समस्त लोगों को पूर्ण वेग से आपके मुख में उसी प्रकार प्रविष्टहोते देख रहा हूँ, जिस प्रकार पतिंगे अपने विनाश के लिए प्रज्जवलित अग्नि में कूदपड़ते हैं |
