अध्याय 11 : विराट रूप
श्लोक 11 .16
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं
पश्यामि त्वां सर्वतोSनन्तरूपम् |
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
पश्यामि विश्र्वेश्र्वर विश्र्वरूप १६
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
His Holiness A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupada's goal of the Hare Krishna Movement is to disseminate Krishna consciousness globally. His mission is to restore humanity's relationship with Krishna, spread spiritual awakening, and encourage harmony & peace, to teach Bhagavad-gita and Srimad Bhagavatam, promote congregational singing, and construct Krishna Temples. He encouraged millions to pursue a deeper spiritual purpose with his prolific publications and international outreach.
अध्याय 11 : विराट रूप
श्लोक 11 .16
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं
पश्यामि त्वां सर्वतोSनन्तरूपम् |
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं
पश्यामि विश्र्वेश्र्वर विश्र्वरूप १६
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 11 : विराट रूप
श्लोक 11 .15
अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे
सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् |
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ-
मृषींश्र्च सर्वानुरगांश्र्च दिव्यान् १५
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 11 : विराट रूप
श्लोक 11 .14
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः |
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत १४
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 11 : विराट रूप
श्लोक 11 .13
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा |
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा १३
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 11 : विराट रूप
श्लोक 11 .12
दिवि सूर्यसहस्त्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता |
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः १२
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 11 : विराट रूप
श्लोक 11 . 10 - 11
अनेकवक्त्रनयनमनेकाअद्भुतदर्शनम् |
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् १०
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् |
सर्वाश्र्चर्यमयं देवमनन्तं विश्र्वतोमुखम् ११
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 11 : विराट रूप
श्लोक 11 . 9
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्र्वरो हरिः |
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्र्वरम् .
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 11 : विराट रूप
श्लोक 11 . 8
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा |
दिव्यं ददामि ते चक्षु: पश्य मे योगमैश्र्वरम् ८
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 11 : विराट रूप
श्लोक 11 . 7
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् |
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ७
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 11 : विराट रूप
श्लोक 11 . 6
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्र्विनौ मरुतस्तथा |
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्र्चर्याणि भारत ६
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 11 : विराट रूप
श्लोक 11 . 5
श्री भगवानुवाच
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोSथ सहस्त्रशः |
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ५
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 11 : विराट रूप
श्लोक 11 . 4
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो |
योगेश्र्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ४
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 11 : विराट रूप
श्लोक 11 . 3
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्र्वर |
दृष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्र्वरं पुरुषोत्तम ३
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 11 : विराट रूप
श्लोक 11 . 2
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया |
त्वत्तः कमलपत्राक्ष महात्म्यमपि चाव्ययम् २
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 11 : विराट रूप
श्लोक 11 . 1
अर्जुन उवाच
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् |
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोSयं विगतो मम १
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
श्लोक 10 . 42
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन |
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ४२
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
श्लोक 10 . 41
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा |
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंSशसम्भवम् ४१
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
श्लोक 10 . 40
नान्तोSस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप |
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ४०
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अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
श्लोक 10 . 39
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन |
न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ३९
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अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
श्लोक 10 . 38
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् |
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ३८
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
श्लोक 10 . 37
वृष्णीनां वासुदेवोSस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः |
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ३७
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
श्लोक 10 . 36
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् |
जयोSस्मि व्यवसायोSस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ३६
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
श्लोक 10 . 35
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् |
मासानां मार्गशीर्षोSहमृतूनां कुसुमाकरः ३५
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
श्लोक 10 . 34
मृत्यु: सर्वहरश्र्चाहमुद्भवश्र्च भविष्यताम् |
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ३४
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
श्लोक 10 . 33
अक्षराणामकारोSस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च |
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्र्वतोमुखः ३३
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
श्लोक 10 . 32
सर्गाणामादिरन्तश्र्च मध्यं चैवाहमर्जुन |
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ३२
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
श्लोक 10 . 31
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् |
झषाणां मकरश्र्चास्मि स्त्रोतसामस्मि जाह्नवी ३१
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
श्लोक 10 . 30
प्रह्लादश्र्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् |
मृगाणां च मृगेन्द्रोSहं वैनतेयश्र्च पक्षिणाम् ३०
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada
अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
श्लोक 10 . 29
अनन्तश्र्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् |
पितृणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् २९
Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada