सोमवार, 5 जनवरी 2026

अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य (श्लोक 10 . 33)












अध्याय 10 : श्रीभगवान् का ऐश्वर्य

श्लोक 10 . 33


अक्षराणामकारोSस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च |

अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्र्वतोमुखः  ३३ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

Of letters I am the letter A, and among compound words I am the dual compound. I am also inexhaustible time, and of creators I am Brahmā.


भावार्थ

अक्षरों में मैं अकार हूँ और समासों में द्वन्द्व समास हूँ | मैं शाश्र्वत काल भी हूँ और स्त्रष्टाओं में ब्रह्मा हूँ |


तात्पर्य

अ-कार अर्थात् संस्कृत अक्षर माला का प्रथम अक्षर (अ) वैदिक साहित्य का शुभारम्भ है | अकार के बिना कोई स्वर नहीं हो सकता, इसीलिए यह आदि स्वर है | संस्कृत में कई तरह के सामसिक शब्द होते हैं, जिनमें से राम-कृष्ण जैसे दोहरे शब्द द्वन्द्व कहलाते हैं | इस समास में राम तथा कृष्ण अपने उसी रूप में हैं, अतः यह समास द्वन्द्व कहलाता है |

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समस्त मारने वालों में काल सर्वोपरि है, क्योंकि वह सबों को मारता है | काल कृष्णस्वरूप है, क्योंकि समय आने पर प्रलयाग्नि से सब कुछ लय हो जाएगा |


सृजन करने काले जीवों में ब्रह्मा प्रधान हैं, अतः वे भगवान् कृष्ण के प्रतिक हैं |