सोमवार, 26 जनवरी 2026

अध्याय 11 : विराट रूप (श्लोक 11 .13)









अध्याय 11 : विराट रूप

श्लोक 11 .13


तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा |

अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा  १३ 


Translation by His Divine Grace Srila A C Bhaktivedanta Swami Prabhupada 

At that time Arjuna could see in the universal form of the Lord the unlimited expansions of the universe situated in one place although divided into many, many thousands.


भावार्थ

उस समय अर्जुन भगवान् के विश्र्वरूप में एक ही स्थान पर स्थित हजारोंभागों में विभक्त ब्रह्माण्ड के अनन्त अंशों को देख सका |


तात्पर्य

तत्र (वहाँ) शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है | इससे सूचितहोता है की जब अर्जुन ने विश्र्वरूप देखा, उस समय अर्जुन तथा कृष्ण दोनों ही रथ परबैठे थे | युद्धभूमि के अन्य लोग इस रूप को नहीं देख सके, क्योंकि कृष्ण ने केवलअर्जुन को दृष्टि प्रदान की थी | वह कृष्ण के शरीर में हजारों लोक देख सका | जैसाकि वैदिक शास्त्रों से पता चलता है कि ब्रह्माण्ड अनेक हैं और लोक भी अनेक हैं |इनमें से कुछ मिट्टी के बने हैं, कुछ सोने के, कुछ रत्नों के, कुछ बहुत बड़े हैं,तो कुछ बहुत बड़े नहीं हैं | अपने रथ पर बैठकर अर्जुन इन सबों को देख सकता था |किन्तु कोई यह नहीं जान पाया कि अर्जुन तथा कृष्ण के बीच क्या चल रहा था |